मोदी-शाह की जोड़ी ने राजनाथ को किया किनारे!

देश की राजनीति में कब कौन सत्ता पर काबिज हो जाए और न जाने कब किसी को कुर्सी से उतार कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए। ऐसा कभी राजघरानों में देखने को मिलता था, जब राजा के खास ही उसे गद्दी से हटाकर खुद उसपर कब्जा जमा लेते थे। लेकिन अब यही हाल भारतीय रााजनीति मेंं देखने को मिल रहा है। 


कभी चाचा-भतीजा तो कभी पूर्व अध्यक्ष से वर्तमान का झगड़ा, राजनीतिक अखाड़े में यह आम बात हो चली है। कुछ ऐसा ही इनदिनों BJP में देखने को मिल रहा है।लोकसभा चुनाव पूर्व ही यह तय हो गया था कि अगर भाजपा दोबारा सत्ता में आती है तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ही देश के गृहमंत्री बनेंगे और हुआ भी यही। 


कभी अमित शाह का नाम पार्टी अध्यक्ष के तौर पर सुझाने वाले राजनाथ ने शायद ही कभी सोचा होगा कि मोदी के बाद नंबर दो की पोजिशन रखने वाले को उनके ही लोग नंबर तीन पर लाकर खड़ा कर देंगे। राजनाथ इस षडयंत्र के अकेले शिकार नहीं हैं, लगभग ऐसा ही भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसों के साथ भी हो चुका है। रथ यात्रा के सहारे पार्टी को उसके इस गंतव्य तक पहुंचाने वाले वयोवृद्ध नेता आडवाणी जी ने भी अपने लिए इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं कर रखी थी। मगर क्या कहें साहब यही राजनीति है!


यहां नादिम नदीम साहब का ये शेर मेरी बात को समझने के लिए काफी है, "इन से उम्मीद न रख हैं ये सियासत वाले, ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले।"


शोले के जय-वीरू की तरह ही 1987 में पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की दोस्ती का शुरू हुआ यह सिलसिला आज तक जारी है। राजनीति के गलियारों में हर कोई अमित शाह को भाजपा का चाणक्य मानता है। इसे चाणक्य नीति ही समझा जाए कि मोदी-शाह की जोड़ी ने एक एक करके अपने बीच के कांटों को निकाल कर किनारे करना शुरू कर दिया है। एक प्रधानमंत्री के तौर पर अपने कार्य कुशलता के बल पर पीएम मोदी बधाई के पात्र तो बन सकते हैं लेकिन संगठनात्मक दृष्टि से उनके इस तरह के फैसलों (राजनाथ को रक्षामंत्री बनाना) को भविष्य के लिए उचित नहीं ठहराया जा सकता है। हालांकि अत्यंत गंभीर राजनाथ ने ऐसी किसी भी हवा को अबतक आंधी बनने का मौका नहीं दिया है। पिछली सरकार में भी राजनाथ सिंह ने कई बार उत्पन्न हुई विषम परिस्थितियों में भी बड़ी ही सहजता से उसका सामना करते हुए पार्टी पक्ष में मामला बनाये रखा।


हालांकि इस सब के बावजूद राजनीति के कुछ पुरोधाओं ने राजनाथ सिंह को मिले रक्षा मंत्रालय को गृह मंत्रालय से ज्यादा महत्वपूर्ण बताते हुए मोदी जी का पक्ष रखने का असफल प्रयास किया। लेकिन वो यह नहीं बता पाए कि रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय से किस तरह से बेहतर और महत्वपूर्ण विभाग है। इतना सब कुछ होते हुए भी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शांति किसी बड़े तूफान की तरफ इशारा कर रही है। जिस तरह से आने वाला समय मोदी-शाह युग के कई अहम फैसलों का गवाह बनेगा, ठीक वैसे ही पार्टी में कलह की मुख्य वजह भी बनेगा। इस बात से क़तई इंकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि हर कोई आडवाणी, मनोहर, स्वराज, राजनाथ, कलराज, कल्याण और गडकरी जैसा नहीं हो सकता है।


🖋️अनुपम चौहान