नई सरकार को करना होगा आर्थिक चुनौतियों का सामना


नयी दिल्ली। वोटिंग खत्म होने के बाद अब सबकी नज़रें 23 मई को आने वाले चुनावों के नतीजों पर टिकी हुयी है। हर कोई यह जानने को उत्सुक है कि जनता ने किसे अपना प्रधानमंत्री चुना है। सत्ता में जो भी आए, नयी सरकार को महंगाई से मंदी तक कई चुनौतियां का सामना करना होगा।मोदी सरकार को 2014-19 तक महंगाई का सामना करने में कोई दिक्कत नहीं हुयी लेकिन अगली सरकार को अब ईंधन और खाद्य पदार्थों के दामों में वृद्धि की वजह से महंगाई के मोर्च पर कठिन लड़ाई लड़नी होगी।


डिमांड में गिरावट
अगली सरकार के लिए एक और बड़ी चुनौती डिमांड में कमी की वजह से आने वाली आर्थिक सुस्ती होगी। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 के आखिरी तीन महीनों में एफएमसीजी सेक्टर की वृद्धि दर 16 फीसदी थी और इस साल के पहले तीन महीनों में गिरकर 13.6 फीसदी रह गई है। ग्रामीण इलाकों में जरूरी वस्तुओं की बिक्री में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गयी है।


जीडीपी दर में कमी
31 मई को जीडीपी के आधिकारिक आंकड़े जारी किये जायेंगे , जिसमें चौथी तिमाही के आंकड़े तीसरी तिमाही में दर्ज 6.6 फीसदी से भी कम रहने का अनुमान है। वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट में भी आर्थिक मंदी को स्वीकारा गया है।


रोजगार का संकट
अर्थव्यस्था के बिगड़ते हालातों की वजह से रोजगार के अवसर उत्पन्न करना भी नयी सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होगा । रोजगार के मुद्दे ने 2014 नरेंद्र मोदी को
सत्ता दिलाई, लेकिन रोजगार संकट को लेकर विपक्ष लगातार उन पर हावी रहा। आर्थिक मंदी से रोजगार के नए अवसर कम पैदा होंगे।


रेवेन्यू का कम होना
अगली सरकार को अपना रेवेन्यू बढ़ाने के लिए काफी जोर लगाना होगा। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों ने डायरेक्ट इनकम सपॉर्ट का वादा किया है। ऐसे समय में जब जीएसटी में सुधार की आवश्यकता और अर्थव्यवस्था में मंदी का खतरा है , अगली सरकार को रेवेन्यू कलेक्शन बढ़ाने के लिए संघर्ष करना होगा ताकि नकदी बांटने की स्कीम को चला सके। विनिवेश और नए स्पेक्ट्रम नीलामी से सरकार कुछ रकम जुटा सकती है।