High Court ने महिला उत्पीड़न आतंरिक परिवाद समिति गठन पर सूचना आयोग से मांगा 24 घंटे में जवाब


लखनऊ। उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयोग में महिलाओं के उत्पीड़न के मामलों की जांचों के लिए आतंरिक परिवाद समिति बनाए जाने की जगह बहानेबाजी करने पर हाई कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए यूपी के सूचना आयोग और मुख्य सूचना आयुक्त को जमकर लताड़ लगाई।


सूचना आयोग को 24 घंटे का समय


जस्टिस देवेन्द्र कुमार अरोड़ा और जस्टिस अलोक माथुर की बेंच ने लखनऊ स्थित समाजसेविका और आरटीआई कार्यकत्री उर्वशी शर्मा द्वारा अधिवक्ता शीतला प्रसाद त्रिपाठी और सौरभ कुमार श्रीवास्तव के मार्फत दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए उर्वशी के अधिवक्ता, शासन के स्थाई अधिवक्ता और सूचना आयोग और मुख्य सूचना आयुक्त के अधिवक्ता शिखर आनंद को सुनने के बाद सूचना आयोग को 24 घंटे का समय देते हुए सुप्रीम कोर्ट के द्वारा विशाखा (Vishakha committee) मामले में दिए गए निर्देशों और महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण प्रतिषेध एवं प्रतितोष) अधिनियम 2013 की धारा 4 के अनुपालन करने एवं आयोग में आतंरिक परिवाद समिति गठित करने के सम्बन्ध में की गई कार्यवाही पर जबाब मांगा है। साथ ही मामले को सुनवाई के लिए आज फिर सूचीबद्ध किया है।


जस्टिस देवेन्द्र कुमार अरोड़ा और जस्टिस अलोक माथुर की बेंच ने


विपक्षी अधिवक्ता शिखर आनंद द्वारा दलील दी गई कि इस मामले में आयोग ने साल 2016 में शासन को पत्र लिखकर कुछ बिन्दुओं पर स्पष्टीकरण मांगे गए हैं। और यह भी बताया गया कि आयोग ने अभी तक आतंरिक परिवाद समिति का गठन नहीं किया है। सूचना आयोग की इस बहानेबाजी से नाराज जस्टिस देवेन्द्र कुमार अरोड़ा और जस्टिस अलोक माथुर की बेंच ने महिला अधिकारों के प्रति उदासीन रवैया रखने पर सूचना आयोग को जमकर लताड़ा और व्यवस्था दी कि आयोग एक स्वायत्त संस्था है और इसीलिये आयोग द्वारा महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण प्रतिषेध एवं प्रतितोष) अधिनियम 2013 के प्राविधानों का अनुपालन करने की अनिवार्यता है। और यह भी कि आयोग को इस सम्बन्ध में शासन से किसी भी प्रकार के स्पष्टीकरण को मांगने की आवश्यकता नहीं है।


समाजसेविका उर्वशी इससे पहले साल 2016 में


याचिकर्ता उर्वशी के अधिवक्ता शीतला प्रसाद त्रिपाठी और सौरभ कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि आयोग में महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण के लिए लम्बे समय से प्रयत्नशील समाजसेविका उर्वशी इससे पहले साल 2016 में भी उनके मार्फत इस मामले को लेकर हाई कोर्ट गईं थीं। तब हाई कोर्ट ने यह माना था कि आयोग इस मामले में खुद संजीदा होकर कार्यवाही करेगा और उर्वशी को निर्देश दिया था कि वे इस मामले में आयोग को पत्र लिखकर दें। लेकिन जब उर्वशी द्वारा बार-बार पत्र भेजने पर भी आयोग ने कार्यवाही नहीं की तो उन्हें मजबूरन दोबारा इस मामले को हाई कोर्ट के समक्ष लाना पड़ा।