भगवान श्री हरि की उपासना ही जीवन का सार है : लखनानन्द महराज


  • श्रीहरि के चरणों में स्थान पाने के लिए दुःसंग का सर्वथा त्याग करना चाहिए 


रायबरेली। प्रकृति के संबन्ध से स्थूल, कारण एवं सूक्ष्म शरीर की प्राप्ति होती है। जब तक कारण रूपी शरीर रहता है तब तक जन्म एवं मृत्यु का चक्कर लगा रहता है। भगवान का दर्शन बडे ही भाग्य से मिलता है। जब तक मनुष्य के अंतःकरण में मान और मद का संचार रहता है तब तक मनुष्य को श्रीहरि के दर्शन नहीं प्राप्त होते हैं। उक्त अमृत कथन राही ब्लाक के रघुनाथपुर कटैली ग्राम में पूर्व ब्लाक प्रमुख राही स्व0 राउरदीन यादव व फूलमती यादव की पुण्य स्मृति में आयोजित श्रीमद भागवत महापुराण कथा ज्ञान यज्ञ के प्रथम दिन कथा व्यास स्वामी सरस्वती लखनानन्द महराज जी ने उपस्थित भारी संख्या में भक्तजनों के समक्ष कही।

 

बताते चलें कि भागवत कथा का साप्ताहिक आयोजन है। व्यास जी कहते हैं कि श्रीहरि के श्रीचरणों में स्थान पाने के लिए दुःसंग का सर्वथा त्याग करना चाहिए, दुःसंग से सदविचार एवं सदाचार का लोप हो जाता है और मनुष्य पाप में प्रवृति हो जाता है। जिस कारण मनुष्य पूजन- पाठ करते हुए भी वास्तविक लाभ से वंचित रह जाता है। कुसंगो का त्याग कर मनुष्य को संतो महापुरूषों की शरण में आने से हर बाधा दूर हो जाती है। भगवान श्री हरि की उपासना ही जीवन का सार है। इस अवसर पर वीरेन्द्र, करन, सुरेन्द्र, नरेन्द, कमलेश, दीपक, जगदीश, राम मनोहर, संतोष, शैलेष, नीरज, पंकज, सुजीत, अमित, दीपेष, प्रभात, अर्चिता, वैष्णवी, वर्णिका, अदिति, लक्ष्य सहित भारी संख्या में भक्तगण उपस्थित रहे।